जब हम असभ्य थे, वनचर थे, खाद्यसंग्रही थे, हमने आग की खोज नहीं की थी; तब हमने इन वृक्षों से धूप में छाँह और बारिश में आड़ माँगी इन्होंने हुलस कर हमें दिया, हमने अपना पेट भरने को फल माँगे इसने अपनी फल-लदी डालियाँ झुका दीं, हमने तन ढंकने को वस्त्र माँगा, इसने खुद नंगा होकर हमें अपने पत्ते और छाल दे दिए यही नहीं जब पत्थरों ने हमें पहली बार आग का दान दिया, ये स्वतः उसके पात्र बन गए— खुद अपना तन हमारे लिए समर्पित कर दिया । जब हम बस्तियों में बसे इन्होंने हमें अपनी झोपड़ियाँ बनाने के लिए लकड़ी दी, पत्ते दिए । और-तो-और, मानव सभ्यता की महान खोजों में से एक पहिया भी इन्हीं का दान है। जब पहले-पहल इनके गोल तने को जमीन पर ठेल कर मनुष्य ने यह जाना कि इनके सहारे हम भारी से भारी पत्थर को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जा सकते हैं । यहाँ तक कि विकास के सारे महत्तर आयोजन इन्हीं के सहारे सम्भव हुए । चेतना, कला और संगीत के तमाम आरम्भिक सूत्र इन्ही की प्रेरणा से प्राप्त हुए। छालों और पुष्पों से रंगे हुए हाथों की दीवारों पर छाप में हमें कला की पहली पहचान, हवा में लहराते पत्तों के संगीत, हवा की थाप पर लचक उठती डालियों से नृत्य तथा आंधी के तेज वेग में टूटकर गिरते हुए वृक्षों और उनके जड़ों से फिर फूटट कर निकालने वाले किल्लों से जन्म-मृत्यु,पुनर्जन्म एवं किसी अज्ञात सत्त्ता में आस्था —यह सबकुछ हमने इन्हीं के सानिध्य में सीखा ( यह अनायास नहीं की दुनिया के प्राचीनतम साहित्य की ऋचाएं और न्यूटन के सिद्धांत दोनों की प्रेरणा ये वृक्ष ही हैं) ।
प्रकृति का मनुष्य के प्रति यह एकात्म,ममत्व या साहचर्य अथवा भ्रातृत्व केवल ज्ञान,दर्शन या काव्य की चौहद्दी तक सीमित नहीं रहा है,बल्कि यह लोक-मानस के खुले आसमान के नीचे ही अधिक विकसित और पुष्ट हुआ है । दार्शनिकों,कवियों और चिंतकों ने तो वहीं से उसे ग्रहण किया । इसलिए वे उसके कर्जदार हैं । हमारी लोकपरम्पराओं में इसके पुख्ता साक्ष्य अब भी हैं । लोककथाएँ, लोकगीत और लोकजीवन में इसके प्रमाण पग-पग पर देखे जा सकते हैं। वृक्ष-पूजा और वृक्ष-विवाह से नदी और पहाड़ की पूजाओं तक ही नहीं पहली बार फल से लड़े हुए आम के विवाह तक और वृक्ष लगाने वाले व्यक्ति द्वारा उसे संतान मानकर उसके फल का सेवन न करने, हरे वृक्ष कों काटने से जुड़े पाप-बोध और पीपल,बरगद आदि वृक्षों को काटने का निषेध तक— ये सभी लोकमान्यताएँ और परम्पराएँ मनुष्य और प्रकृति के इसी साहचर्य कों व्यक्त करती हैं । ऊपरी तौर पर रुढ़ि प्रतीत होने वाली इन परम्पराओं के भीतर प्रवेश करना नई पीढ़ी के हम बौद्धिकों के लिए मूर्खता है। बट-वृक्ष की लंबी-लंबी बरोह को पकड़ कर झूलने वाले बच्चे के लिए वह बट दादा है, सावन के माह में मायके आई युवती का नीम के पेड़ पर झूला डाल कजरी गाते हुए झूलना और उसमें प्रिय के प्रति प्रेम और विरह की अभिव्यक्ति करना, केवल परंपरा-पालन नहीं है; ये मनुष्य और प्रकृति के सनातन सहचर्य की अभिव्यक्ति ही हैं। भोजपुरी क्षेत्र के विवाह-समारोहों में एक सामान्य रस्म है ‘पित्तर नेवतल’ अर्थात पितर-गण को निमंत्रण। तिलक के बाद शगुन उठना, पितर नेवतना और हल्दी ये विवाह-पूर्व तीन मुख्य रस्में होती हैं, जो अनिवार्यतः लड़की और लड़के दोनों घरों में होती हैं । इन अनुष्ठानों में पुरोहित अनुपस्थित रहता है । स्त्रियाँ इस अवसर पर सारे कर्मकांड स्वयं सम्पन्न करती हैं। अतः इनका संबंध शुद्ध रूप से लोक परंपरा से माना जा सकता है । यदि इस अवसर पर स्त्रियॉं द्वारा गाए जाने वाले गीतों को ध्यान से सुनें तो न केवल विवाह वाले घर के पितर-गण आमंत्रित होते हैं, बल्कि अंधिया,पनिया, हड़वा, मटवा, संपवा, बिछिया सब आमंत्रित होते हैं। यह आमंत्रण उनकी तुष्टि और वर-वधु के लिए आशीर्वाद की कामना के लिए की जाती है । यह परंपरा मानव-प्रकृति के पारंपरिक रिश्तों की गवाह है । हल्दी के साथ ‘मटकोर’ (मिट्टी गोड़ना) भूमि (उर्वरता या उत्पत्ति की अधिष्ठात्री) की पूजा का विधान है । ये परम्पराएँ अब अवशेष मात्र बनकर नगरीय जीवन में महिला संगीत के‘शार्टकट फार्म’ और मेंहदी की नव-आयातित‘सेलिब्रेशन’ संस्कृति के हवाले हो चली है ।

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