शुक्रवार, 22 जून 2018

हमारी बंधक है नदी

हमने नदी को अपने इसी प्रेम-पाश में बाँध लिया है। वह प्रेयसी नहीं, 
हमारी बंधक है— हमारे अनुरंजन का, भोग का और तृप्ति का साधन मात्र। हम उसे भोग रहे हैं, उससे अनुरंजित हो रहे हैं और तृप्त होने के बजाय अपनी वासना को और अधिक उत्तेजित कर रहे हैं। उसकी आत्मा की मसान पर अपनी ऐषणा की धुनी रमाए फुत्कार रहे है—‘ये दिल माँगे मोर। हमारे इस मोर का कोई अंत नहीं, कोई सीमा नहीं। हम उसके शव में भी अपनी सिद्धि देख रहे हैं। वह हमारे लिए द्रौपदी का अक्षय-पात्र है, और हम परीक्षा लेने के लिए दुर्वासा बन उसके सामने आ डटे हैं। विडम्बना यह कि द्रौपदी के सामने उनके सखा कृष्ण का सहारा था, लेकिन नदी? वह निरुपाय है। उसका सहस्राब्दियों का सहचर, उसका प्रिय मनुष्य स्वयं दुर्वासा बनकर सामने आ खड़ा है। अपने भोग के लिए उसके सारे वजूद को मिटा डालना चाहता है। उसके बालू, उसके पत्थर, उसकी सीपी, उसके जीव, उसकी गति-तरंग, उसका पाट— सब-कुछ। बूँद-बूँद, कण-कण, ईंच-ईंच।
नदी केवल धरती के भूगोल में बहने वाली नदी नहीं है। वह जितनी बाहर है, उतनी ही भीतर भी। वह अंतःसलिला है। हमारे भीतर निरंतर बह रही है। अनेक-अनेक सहस्राब्दियों से अनेक नाम, अनेक रूप नदी। अपनी सहस्र-सहस्र भुजाओं वाली नदी। हिम की तरह शीतल और खौलते हुए जल की तरह उष्ण जल वाली नदी। समुद्र जैसे खारे और दूध की तरह सुस्वादु जल वाली नदी। सिंधु-ब्रह्मपुत्र की तरह विशाल और वरुणा-असी की तरह मृत-प्राय नदी। यमुना और काली की तरह गँदली और भागीरथी-अलकनंदा की तरह झिर-झिर निर्मल नदी। कर्मनाशा की जैसी अभिशिप्त और नर्मदा की तरह पुण्यशीला नदी। इन नदियों के कोई घाट, कोई तटबंध, कोई प्रवाह क्षेत्र, कोई विभाजक रेखा नहीं है। यहाँ सब घुला-मिला, सब सहज और सब एक दूसरे में डूबा हुआ है। सब समरस, सब समशील, सब अविभाजित, सब अखण्ड, सब आनंदमय, जिह्वा संवेद्य षड्-रस से परे, अद्भुत और अपूर्व।