गुरुवार, 2 अगस्त 2018

हमारे भीतर की नदी छीज रही है

हम बाहर की नदीयों को जोड़ना चाहते हैं। मृत हो चुकी नदियों को पुनर्जीवित करना चाहते हैं। एक नदी का जल दूसरे में स्थानांतरित करना चाहते हैं। लेकिन हमारे भीतर की नदी छीज रही है, सूख रही है, विभाजित हो रही है। हमें उसकी चिंता नहीं। हाथों में लहराती तख्तियाँ,उठी हुई बाहों के साथ उछलते नारों और दंगों की चोट से टूटते अखंड कगारों की चिंता हमें नहीं। स्वाद, रंग, घाट की होड़ में बिखरती समन्विति की चिंता हमें नहीं। हम अपने भीतर के देवत्व को फाँसी देकर मंदिरों, मठों, गिरजाघरों में उसकी मूर्तियाँ सजाना चाहते हैं। उसकी लाश पर मस्जिदों की ऊँची मीनारें और भव्य मजारें बनाना चाहते हैं। भीतर के रस के अखंड और शाश्वत प्रवाह को नष्ट कर जगह-जगह कृत्रिम फब्बारे लगाना चाहते हैं। हमरे भीतर की नदी छीज रही है। हमारे भीतर का रस सूख रहा है। हमारे भीतर का देवत्व बधिक के गँडासे के सामने उकुडूँ बैठा है, पर हमारे लिए वह देवता नहीं देवी का निर्माल्य है या कुर्बानी का बकरा। हम जोर-जोर से हर-हर महादेव’, अल्ला हु अकबर और सत श्री अकाल के नारे लगा रहे हैं। हमारे स्वरों के बीच की समरसता विलुप्त हो चुकी है। हमारे भीतर की अंतःसलिला में अलग-अलग रंग और अलग-अलग स्वाद वाली सदानीरा नदियाँ अब आपस में डूबकर अपूर्व रंग और अद्भुत स्वाद की सृष्टि नहीं करतीं, बल्कि अपने-अपने तटों में सिमट कर चल रही हैं। कोई भागीरथी, कोई अलकनंदा, कोई नर्मदा, कोई गंगा, कोई ब्रह्मपुत्र नहीं, हमारे भीतर बहने वाली हर धारा या तो मल-वाहिनी असी है या पुण्य-क्षीणा कर्मनासा। यह हमारे भीतर के मल को ढो रही है। हमारी यांत्रिकता, लिप्सा और स्वार्थपरता के सारे अपशिष्ट इसमें घुल रहे हैं। यह दिन-ब-दिन विषाक्त होती जा रही है। हमारे लोभ, मद, मोह, तृषा, भोग, वासना, एषणा, हिंसा, व्यभिचार,पापाचार, के भार ने इसे बोझिल बना दिया है। यह झिर-झिर, निर्मल परदर्शी नहीं, हमारे भीतर की कुँठाओं के रंग में रंगी है। यह कठौती वाली गंगा है। इसके घाट पर बैठा कोई तुलसीदास अब यह दावा नहीं कर सकता कि सुरसरि सम सबकर हित होई
       मेरा आदिम मन फिर भी नहीं मानता। उसके भीतर बैठा नदी-प्रेम अब-भी जब-तब हुलस उठता है। अब-भी किसी नदी की कछार पर पहुँचते ही उसके प्रेम का कोई-कोई गीत कंठ से फूट ही जाता है। यह कंठ भले मेरा अपना हो, पर बोल मेरे मन के भीतर बैठे उस आदिम मनुष्य के ही होते हैं, जो अपनी छोटी डोंगी में सदियों से निरंतर उस नदी की लहरों पर झिझिरी खेल रहा है। वह नदी से प्रेम करता है, उसे पूजता है, उसे मातृ-रूप मानता है और इसलिए नदी अब तक उसके लिए संसाधन नहीं बन पाई, वह उसका उपभोग नहीं कर पया। सूख चुकी नदी के ऊँचे कगार पर बैठा वह अब भी गा रहा है। उसे उम्मीद है कि नदी नहीं मरती। वह देवी-स्वरूपा है और देवता अमृत हैं। वह फिर जी उठेगी। अपनी अदम्य जिजीविषा से कोई एक सोता धरती के इस कठोर कवच को तोड़ कर बह चलेगा। अचानक कोई पाताल-गंगा फूट पडेगी,जिसकी धारा में भींग कर यह सारा विरस आयोजन सरस हो जाएगा, जिसमें डूबकर असी और कर्मनासा भी स्वच्छ, प्रशस्त और पवित्र हो जाएगी। तब वह अपनी डोंगी पर पाल डाल हर नगर, हर गाँव, हर घाट-अघाट, अपना गीत, अपना रस, अपना राग बाँट आएगा। 
#नदी #जीवन #बाँध #पर्यावरण #विकास

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