प्रकृति और मनुष्य का सहचर्य लोक-मानस के खुले आसमान के नीचे ही अधिक विकसित और पुष्ट हुआ है । दार्शनिकों,कवियों और चिंतकों ने तो वहीं से उसे ग्रहण किया । इसलिए वे उसके कर्जदार हैं । हमारी लोकपरम्पराओं में इसके पुख्ता साक्ष्य अब भी हैं । लोककथाएँ, लोकगीत और लोकजीवन में इसके प्रमाण पग-पग पर देखे जा सकते हैं। वृक्ष-पूजा और वृक्ष-विवाह से नदी और पहाड़ की पूजाओं तक ही नहीं पहली बार फल से लड़े हुए आम के विवाह तक और वृक्ष लगाने वाले व्यक्ति द्वारा उसे संतान मानकर उसके फल का सेवन न करने, हरे वृक्ष कों काटने से जुड़े पाप-बोध और पीपल,बरगद आदि वृक्षों को काटने का निषेध तक— ये सभी लोकमान्यताएँ और परम्पराएँ मनुष्य और प्रकृति के इसी साहचर्य कों व्यक्त करती हैं । ऊपरी तौर पर रुढ़ि प्रतीत होने वाली इन परम्पराओं के भीतर प्रवेश करना नई पीढ़ी के हम बौद्धिकों के लिए मूर्खता है। बट-वृक्ष की लंबी-लंबी बरोह को पकड़ कर झूलने वाले बच्चे के लिए वह बट दादा है, सावन के माह में मायके आई युवती का नीम के पेड़ पर झूला डाल कजरी गाते हुए झूलना और उसमें प्रिय के प्रति प्रेम और विरह की अभिव्यक्ति करना, केवल परंपरा-पालन नहीं है; ये मनुष्य और प्रकृति के सनातन सहचर्य की अभिव्यक्ति ही हैं। भोजपुरी क्षेत्र के विवाह-समारोहों में एक सामान्य रस्म है ‘पित्तर नेवतल’ अर्थात पितर-गण को निमंत्रण। तिलक के बाद शगुन उठना, पितर नेवतना और हल्दी ये विवाह-पूर्व तीन मुख्य रस्में होती हैं, जो अनिवार्यतः लड़की और लड़के दोनों घरों में होती हैं । इन अनुष्ठानों में पुरोहित अनुपस्थित रहता है । स्त्रियाँ इस अवसर पर सारे कर्मकांड स्वयं सम्पन्न करती हैं। अतः इनका संबंध शुद्ध रूप से लोक परंपरा से माना जा सकता है । यदि इस अवसर पर स्त्रियॉं द्वारा गाए जाने वाले गीतों को ध्यान से सुनें तो न केवल विवाह वाले घर के पितर-गण आमंत्रित होते हैं, बल्कि अंधिया,पनिया, हड़वा, मटवा, संपवा, बिछिया सब आमंत्रित होते हैं। यह आमंत्रण उनकी तुष्टि और वर-वधु के लिए आशीर्वाद की कामना के लिए की जाती है । यह परंपरा मानव-प्रकृति के पारंपरिक रिश्तों की गवाह है । हल्दी के साथ ‘मटकोर’ (मिट्टी गोड़ना) भूमि (उर्वरता या उत्पत्ति की अधिष्ठात्री) की पूजा का विधान है । ये परम्पराएँ अब अवशेष मात्र बनकर नगरीय जीवन में महिला संगीत के‘शार्टकट फार्म’ और मेंहदी की नव-आयातित‘सेलिब्रेशन’ संस्कृति के हवाले हो चली है ।
निश्चित रूप से आरंभ में जब मनुष्य और प्रकृति के बीच का रिश्ता आज की तरह इतना सरल, इतना एक रेखीय और इतना सपाट नहीं था,मनुष्य लेता तब भी था और अब भी है, लेकिन तब मनुष्य में कुछ हया बची थी । वह लेता था तो उसकी दानशीलता का सम्मान भी करता था । वह प्रकृति के साथ एक रागात्मक लगाव भी महसूस करता था या फिर उसे पूजता भी था । दुनिया की तमाम आदिम संस्कृतियों में प्रकृतिपूजा के जो साक्ष्य मिलते रहे हैं, वे केवल प्रकृति से भय या आतंक के कारण नहीं हैं, बल्कि उससे लगाव और सम्मान के कारण भी हैं। भारत को ही लें तो गंगा मैया बाढ़ के लिए नहीं, अपनी पोषक-वृत्ति के कारण उपास्य या श्रेष्ठ हैं । भारतीय परंपरा में जो भी सरस है, जीवनदायी है; वह माँ है । नदी, धरती या गो इन्हीं अर्थों में मातृ-स्वरूपा हैं । तीनों रसवंती हैं, तीनों जीवनी शक्ति का स्रोत हैं और तीनों में पोषण-वृत्ती है । प्रकृति में जो भी जीवन है उसको सरसता धरती की नसों से ही मिलती है । उसमें प्राणत्व का संचार उसी से होता है । धरती रसवंती है और आकाश उजस्विन् । आकाश प्रकाश का,चेतना का, ज्ञान का, ऊर्जा का स्रोत है । वह सूर्य-चंद्रमा को धारण करता है । सूर्य समूची सृष्टि को ऊर्जा प्रदान करता है । इसलिए आकाश पिता है । इसी तरह पीपल देवता है तो अपनी छाँव शीतलता और हवा के कारण और यह देवत्व ही कई बार प्रकृति की रक्षा का हेतु बन जाता था । गाँव-घर में अनेक तीज-त्यौहार होते थे; उत्सव होते थे, जिनमें प्रकृति के उपादानों का प्रयोग होता था । मंगल घट के ऊपर विराजने वाला आम्रपल्लव, तोरणों में सजा अशोक और पुशपहरों में गूँथें हुए पुष्प हमारी प्रकृति की आदिम आसक्ति के अवशेष हैं । हुआ यह कि हम जैसे-जैसे प्रकृति से दूर होते गए, वैसे-वैसे अपने पुराने संस्कारों को धर्म और परंपरा की ताबीज में गूँथ कर अपने गले में धरण करते गए । पुराना राग छूटता गया, लेकिन ताबीज नहीं छूटी । नदी या सरोवर के भरे-पूरे जल को छोड़ हमने उसे मिट्टी के घड़े में समेट लिया और उस जल को पवित्रता-बोध से जोड़कर कलश के रूप में अपने पूजा-गृह, और विवाह-मंडप के मंगल घट से तर्पण के घट तक हर जगह शामिल कर लिया । नतीजा,प्रकृति छूटी नहीं वह साथ चलती रही, पर उस जीवंत रूप मैं नहीं रूढि-मात्र के रूप में, सकुची-सिमटी-सी हमारे पार्श्व में घिसटती हुई । न्याय का,विवेक का, ज्ञान का प्रतीक जल अविवेकपूर्ण कर्मकांड का अंग-भर बन गया और उसका देवता वरुण धीरे-धीरे नदियों, झरनों, सरोवरों और सागरों के गतिशील, प्रशांत या उमड़ते हुए आश्रयों को छोड़ कर स्वर्ग में जा विराजा । वह केवल जल का देवता नहीं, सत्य और न्याय का भी देवता है । कहाँ तो सरस जल और कहाँ सत्य और न्याय के शुष्क और कठोर विधान । अद्भुत मेल है यह । दर-असल यह मेल ही भारतीयता है । कठोर के साथ सरस,सत्य के साथ करुणा, त्याग के साथ भोग का यह अपूर्व साहयचर्य ही ‘भारतीयता’ की पहचान है ।
