मनुष्य केवल याचक रहा है । इसलिए हमेशा हाथ फैलाए वह वृक्षों के सामने खड़ा ही रहा है । वृक्ष ही क्यों? समूची प्रकृति और उसके तृण-तृण के सामने यह महामानव हमेशा एक याचक ही रहा है ।अपनी सारी उपलब्धियाँ, सारे सभ्यता-व्यापर और सारे ज्ञान-विज्ञान को सामने रखकर भी, वह हमेशा अदना ही रहा । यह बात अलग है कि अपने इस बौनेपन के बावजूद मनुष्य हमेशा उर्ध्वबाहु होकर प्रकृति के औदात्य को चुनौती देता रहा । जब उसके सामने उसने खुद को विवश ही पाया तो झिझक कर स्वीकार भी कर लिया— 'यद्यपि छोटी बाँहों वाला बौना मैं, बड़ी बाँहों वाले मनुष्यों को सहज लभ्य फलों को तोड़ने के लिए ऊपर बाँह करके हँसी का पात्र ही बनूँगा' (रघुवंशम्/कालिदास) । पर, इस आत्मदैन्य की स्वीकृति कालिदास जैसे किसी महाकवि के लिए ही सम्भव थी; हम जैसे रोटी-पानी के जुगाड़ में लगे 'मनई' तो अपने मनुष्य होने की उपलब्धि पर ही इतराते रहे । पेड़ों को कौन कहे, पूरी प्रकृति ही हमें चाकर नज़र आती रही और हम 'श्रेष्ठतम् (अर्थत् मनुष्य ) की उत्तरजीविता’ को अनिवार्य मानते रहे । हमारी दृष्टि में इस सृष्टि का चरम विकास है, मनुष्य । इसलिए वह शेष प्रकृति से श्रेष्ठ है और इस समूची सृष्टि की धुरी बनकर उसे अपने इंगित पर नचाने की क्षमता रखता है । ‘सृष्टि उसके जीवन की संभावनाएँ प्रस्तुत करती है और मनुष्य इनका कुशल दोहन करता है’— ऐसा मनाने के क्रम में, कुशलता और अकुशलता के बीच की पतली दीवार कब दरक गई और कब यह धरती उघाड़ हो गई, यह हम नहीं समझ सके । ज्ञान-विज्ञान की सारी साधनाएँ, सारी चिंताएँ और सारा व्यावहारिक क्रिया-व्यापार केवल और केवल मनुष्य को केंद्र में रखकर ही चलते रहे, हम भूल गए कि इस सृष्टि में कोई सखा, कोई सहचर या कोई मित्र भी है; ‘मनुष्य धरती की संतान है, वह इसी की धूल-माटी में पल-सनकर बड़ा हुआ है’ —ये बातें तो हम बहुत पहले ही भूल चुके थे । परिणाम, प्रकृति का हर संसाधन धीरे-धीरे हमारी मुट्ठी में सिमटता गया और हम अपने विजय का उत्सव मनाते रहे ।
आज हमारे और प्रकृति के बीच के रिश्ते में तेजी से गिरावट आई है । इस गिरावट के मूल में हमारी असीमित इच्छाएँ और प्रकृति की देने की क्षमता के बीच के संतुलन का अभाव है । अनियंत्रित विकास, असीमित जनसंख्या और अदम्य इच्छाओं के त्रिक के बीच जकड़ी यह प्रकृति असहाय हो गई है । ‘ये दिल माँगे मोर’ के फलसफे वाली हमारी पीढ़ी के लिए उसकी इस असहायता को महसूस करना संभव नहीं। हम तो अपनी सुख-सुविधाओं, जरूरतों और विलासिताओं में डूबे हुए लोग हैं, हमें भला उसके बाहर सिर निकालकर प्रकृति के आँगन में झाँकने की क्या जरूरत ? हमारे लिए प्रकृति की सुंदरता का अर्थ है, शिमला, मसूरी, नैनीताल और लद्दाख की पर्यटक यात्राएँ, केरल, गोवा और अंडमान के समुद्रतटीय सैकत कूलों पर आमोद और विहार या संरक्षित और सुरक्षित वनों में बंद गाड़ियों में बैठकर चाक्षुष-मृगया-व्यापार। हमें इससे कोई लेना-देना नहीं कि इन पर्वतीय अंचलों, समुद्रतटीय क्षेत्रों और वनों में छोड़े गए हमारे कचरे, धुएँ या कबाड़ इस प्रकृति के हृदय में कितना गहरा घाव कर रहे हैं, हम अपनी ही आब-ओ-हवा में कितना जहर घोल रहे हैं और इनका दूरगामी प्रभाव क्या होगा ? सच तो यह है कि पर्यावरण की रक्षा केवल कागजी रस्मों, इश्तेहारों और कार्यक्रमों के आयोजन-प्रयोजन से नहीं होगी । इसके लिए प्रकृति और मनुष्य के बीच के दरकते हुए संबंध-सेतु को पुनर्संयोजित करना होगा, उसे मजबूती देनी होगी और मानव को एक बार फिर अपने भीतर प्रकृति के प्रति रागात्मक अनुभूति जागृत करनी होगी । उसे एक बार फिर अपने श्रद्धापूरित हृदय से स्वीकार करना होगा— माता भूमिः। पुत्रोहं पृथिव्याः। बिना श्रद्धा, बिना, आस्था या बिना राग के प्रकृति और मनुष्य के परस्पर साहचर्य को पुनरास्थापित या पुनर्जीवित करना दुःसाध्य है ।
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